अडानी ग्रुप (Adani Video Take Down) से जुड़े मानहानि केस में केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने बड़ा कदम उठाया है। मंत्रालय ने रवीश कुमार, ध्रुव राठी, न्यूज़लॉन्ड्री, द वायर, HW न्यूज़ और आकाश बनर्जी के चैनल ‘द देशभक्त’ समेत कई पत्रकारों व मीडिया हाउस को नोटिस जारी किया है। आदेश में यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर डाले गए कंटेंट हटाने को कहा गया है।
मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि कुल 138 यूट्यूब वीडियो और 83 इंस्टाग्राम पोस्ट हटाने होंगे। इनमें न्यूज़लॉन्ड्री के अकेले 42 वीडियो शामिल हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि सिर्फ खोजी रिपोर्ट ही नहीं बल्कि व्यंग्य, पॉडकास्ट और यहां तक कि इंटरव्यू भी इस लिस्ट में शामिल किए गए हैं।
मसलन, कॉमेडियन कुनाल कामरा का वह इंटरव्यू भी हटाने को कहा गया है, जिसमें उन्होंने सेंसरशिप पर मजाक किया था। इसी तरह एनडीटीवी टेकओवर और धारावी प्रोजेक्ट पर की गई रिपोर्ट्स, TV Newsance के एपिसोड और यहां तक कि शरद पवार व अजित पवार के इंटरव्यू भी इस आदेश में शामिल हैं।
किस आधार पर लिया कोर्ट ने ऐसा फैसला?
यह कार्रवाई दिल्ली की रोहिणी कोर्ट के एक आदेश के आधार पर हुई है। छह सितंबर को कोर्ट ने अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) की याचिका पर एक्स-पार्टी ऑर्डर जारी किया था। कोर्ट ने कहा था कि पांच दिन के भीतर मानहानिकारक सामग्री हटा दी जाए। मंत्रालय का कहना है कि मीडिया संस्थानों ने तय समय में कार्रवाई नहीं की, इसलिए अब नोटिस जारी किया गया है।

इस आदेश के खिलाफ पत्रकारों ने अपील दायर की है। परनॉय गुहा ठाकुरता, जिन पर अडानी ग्रुप पहले भी छह बार केस कर चुका है, ने कहा कि वह अपनी रिपोर्टिंग पर कायम हैं। उनका कहना है कि उनकी रिपोर्टिंग तथ्यात्मक, निष्पक्ष और पब्लिक इंटरेस्ट में है और उन्हें न्यायपालिका पर भरोसा है।
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वहीं, वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने सवाल उठाते हुए कहा कि कोर्ट का आदेश इंटरमीडियरी को लागू करना होता है, तो सरकार बीच में क्यों आई। उनका कहना है कि सरकार न्यायिक प्रक्रिया से पहले ही कार्रवाई कर रही है।
अडानी कंपनी ने क्या लगाया आरोप?
अडानी एंटरप्राइजेज का दावा है कि लगातार बेसलेस और दुर्भावनापूर्ण रिपोर्टिंग से उसकी ब्रांड वैल्यू और निवेशकों का भरोसा प्रभावित हुआ है। कंपनी का कहना है कि इस तरह की खबरों से उसके प्रोजेक्ट्स में देरी होती है और मार्केट में नकारात्मक असर पड़ता है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह मामला सिर्फ मानहानि तक सीमित है या फिर आलोचनात्मक पत्रकारिता पर रोक लगाने की कोशिश हो रही है।
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