यह कहानी उस देश की है जिसके पास सऊदी अरब से भी ज़्यादा तेल है, लेकिन गलत फैसलों और खराब नीतियों ने उसे दुनिया की सबसे बदहाल अर्थव्यवस्थाओं में बदल दिया। कभी अमीरी की मिसाल रहा यह देश आज हालात ऐसे झेल रहा है कि उसके लाखों नागरिक देश छोड़ने को मजबूर हो चुके हैं।
हम बात कर रहे हैं वेनेजुएला (Venezuela) की, जहां शनिवार 3 जनवरी को अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में ले लिया। दक्षिण अमेरिका में घट रही इस घटना का असर भारत जैसे दूर बैठे देशों पर भी पड़ सकता है।
1950–70 का दौर: जब वेनेजुएला सोने की खान था
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया के ज़्यादातर देश तबाही से उबर रहे थे, उसी वक्त वेनेजुएला ज़मीन के नीचे छिपे काले सोने यानी तेल की वजह से तेज़ी से अमीर बन रहा था। 1952 तक वेनेजुएला दुनिया का चौथा सबसे अमीर देश बन चुका था। राजधानी काराकस में आलीशान इमारतें, महंगी कारें और लग्ज़री लाइफ आम बात थी।

1960 के दशक में वेनेजुएला ने सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों के साथ मिलकर OPEC की नींव रखी। 1970 के दशक में जब पूरी दुनिया तेल संकट से जूझ रही थी, तब वेनेजुएला तेल की ऊंची कीमतों से बेहिसाब कमाई कर रहा था। उस दौर में लोग वीकेंड पर शॉपिंग करने अमेरिका के मियामी तक उड़ान भरते थे। देश की प्रति व्यक्ति आय कई यूरोपीय देशों से भी ज्यादा हो चुकी थी।

वेनेजुएला की बर्बादी की नींव कैसे पड़ी?
इतिहास में शायद ही कोई उदाहरण मिले जहां बिना युद्ध के कोई देश इतनी तेजी से तबाह हुआ हो। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था गिरने की तीन बड़ी वजहें रहीं—
1. सिर्फ तेल पर निर्भरता: देश ने खेती, मैन्युफैक्चरिंग और उद्योगों को नजरअंदाज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि रोज़मर्रा की चीज़ों के लिए भी उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ा।
2. मुफ्त योजनाओं की राजनीति: 1999 के बाद सरकारों ने भविष्य के निवेश के बजाय सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं पर पैसा बहाया। जब तक तेल महंगा था, सब ठीक रहा, लेकिन जैसे ही कीमतें गिरीं, सरकारी खजाना खाली हो गया।
3. भ्रष्टाचार और पलायन: सरकारी तेल कंपनी PDVSA से अनुभवी इंजीनियरों को हटाकर राजनीतिक समर्थकों को बैठा दिया गया। इससे उत्पादन गिरा और करीब 60 लाख पढ़े-लिखे लोग देश छोड़कर चले गए।

वेनेजुएला की 80% GDP साफ
2018 तक वेनेजुएला में महंगाई 1,30,000% के पार पहुंच गई। लोग अंडे और दूध खरीदने के लिए नोटों की गड्डियां तौलकर देने लगे। जहां कभी देश रोज़ाना 35 लाख बैरल तेल निकालता था, वहीं आज उत्पादन घटकर 8–11 लाख बैरल पर सिमट गया है। हालत यह है कि तेल का देश होते हुए भी पेट्रोल बाहर से मंगाना पड़ रहा है। 2012 में वेनेजुएला की GDP करीब 372 अरब डॉलर थी, जो 2020 में गिरकर 43 अरब डॉलर रह गई। फिलहाल इसमें थोड़ी रिकवरी आई है, लेकिन यह अभी भी पुराने स्तर से बहुत नीचे है।
वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन से भारत को क्या फायदा?
वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन का असर भारत तक महसूस किया जा सकता है। भारत अपनी कुल ज़रूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। अब तक अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत वेनेजुएला से तेल नहीं खरीद पा रहा था, लेकिन अगर वहां अमेरिका समर्थित स्थिर सरकार बनती है और प्रतिबंध हटते हैं, तो भारत को वेनेजुएला से सस्ते दामों पर कच्चा तेल मिलने की संभावना बन सकती है।
इससे देश में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है और आम लोगों को राहत मिल सकती है। इसके साथ ही भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज, जिसकी रिफाइनरी वेनेजुएला के भारी और गाढ़े तेल को प्रोसेस करने में सक्षम है, को दोबारा कारोबार शुरू करने का मौका मिल सकता है। वहीं सरकारी कंपनी ONGC का वेनेजुएला में फंसा हुआ निवेश भी वापस पटरी पर आने की उम्मीद है, जिससे भारत के ऊर्जा क्षेत्र को सीधा फायदा हो सकता है।
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