7 संतानों की सताई मां, दिल तोड़ देगी विदिशा की गेंदाबाई की कहानी

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मां कभी थकती नहीं… लेकिन जब वही मां बूढ़ी हो जाए, तो उसके बच्चे ही उसे बोझ समझने लगते हैं। ऐसी ही काहनी है विदिशा जिले की रहने वाली गेंदाबाई (Vidisha Gendabai)  की। गेंदा बाई ने पूरी जिंदगी अपने बच्चों के लिए जिया। अपने सुख-दुख की परवाह किए बिना उन्होंने बेटों-बेटियों को पढ़ाया-लिखाया, घर-परिवार बसाया लेकिन, जब बुढ़ापा आया और पति की मौत के बाद उन्हें सहारे की ज़रूरत हुई तो उनकी सातों संतानें उन्हें बोझ समझने लगीं।  आज वो वृद्धाश्रम की दीवारों के सहारे जीवन के अंतिम दिन काट रही हैं।

हैरानी की बात ये है कि 85 वर्षीय गेंदा बाई का मामला प्रशासनिक अधिकारियों के सामने पहुंचा, लिखित में एग्रीमेंट हुआ की बेटा-बेटी एक-एक महीने मां की सेवा करेंगे लेकिन महज बीस दिन में ही गेंदा बाई को उनकी खुद की बेटी वृद्धाश्रम के दरवाज़े पर छोड़कर भाग गई। वृद्धाश्रम की संचालक ने गेंदा बाई की दयनीय स्थिति को देखते हुए बताया कि “यह कहानी सिर्फ गेंदा बाई की नहीं, हजारों गेंदा बाइयों की कहानी है।”

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सात बच्चों में फुटबॉल बनकर रह गई मां
इस एग्रीमेंट के मुताबिक मां को रखने के लिए विदिशा में रहने वाली बड़ी बेटी का पहला नंबर आया। सबके सामने तो वो बेटी मां को लेकर गई लेकिन 4 दिनों बाद ही ऑटो में बैठाकर मां को वृद्धाश्रम के गेट पर छोड़ गईं। वेद प्रकाश बताते हैं कि जब बेटी अपनी मां को छोड़कर जा रही थी तो उन्होंने उन्हें टोका, रुकने के लिए कहा लेकिन उसने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा और वहां से तेजी से भाग गईं. वेद प्रकाश बताते हैं कि काउंसलिंग के दौरान भी सातों बच्चों में मां एक फुटबॉल की तरह इधर-उधर जाती दिख रही थीं।

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आर्थिक रुप से सक्षम है गेंदाबाई का परिवार
गेंदाबाई का कोई भी बच्चा आर्थिक तौर पर कमजोर नहीं है सभी सक्षम हैं लेकिन कोई अपनी मां को रखने के लिए तैयार नहीं है। वृद्धाश्रम की संचालक इंदिरा शर्मा कहती हैं “जिस हाल में गेंदा बाई को छोड़ा गया, वो शब्दों में बयान करना मुश्किल है। सात संतानें होते हुए भी अगर एक मां को वृद्धाश्रम में रहना पड़े, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?” इस वक्त गेंदा बाई की मानसिक और शारीरिक हालत दोनों बिगड़ चुकी है।

गेंदाबाई ये समझने की स्थिति में ही नहीं है कि वे अपने घर में नहीं बल्कि वृद्धाश्रम में रह रही हैं। जब कोई अनजान चेहरा गेंदा बाई के पास आता है, तो वे उसे अपने बेटे, पोते या नाती की शक्ल में देखने लगती हैं। उनकी आंखें आज भी उम्मीद से भरी हैं कि शायद उनका कोई अपना उन्हें लेने आएगा।

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