-गजट अधिसूचना की त्रुटि बनी सबसे बड़ी बाधा, प्रशासन की चुप्पी से आक्रोश बढ़ा
हनुमानगढ़। अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाण पत्र की मांग को लेकर धानका समाज का संघर्ष अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। जिला कलक्ट्रेट परिसर के बाहर चल रहा यह धरना बुधवार को 31वें दिन में प्रवेश कर गया। लंबे समय से जारी इस आंदोलन ने अब और ज्यादा तीखा रुख अख़्तियार कर लिया है। समाज के नेताओं ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि वह जानबूझकर मामले को टाल रहा है और समुदाय की समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रहा।
विवाद की जड़ 18 सितंबर 1976 की गजट अधिसूचना है। इसमें अंग्रेज़ी में धानका समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया था, लेकिन हिंदी अनुवाद में गलती से “धानका” की जगह “धाणका” लिखा गया। ‘ण’ और ‘न’ के इस मामूली अंतर का हवाला देकर हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों में धाणका समाज के लोगों को एसटी प्रमाण पत्र जारी नहीं किए जा रहे हैं।
संघर्ष समिति के अध्यक्ष दीपक धाणका और महासचिव जितेंद्र जी धाणका ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के कई फैसले साफ़ तौर पर समाज के पक्ष में हैं। बावजूद इसके जिला प्रशासन तकनीकी बहाने बनाकर प्रमाण पत्र देने से बच रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रशासनिक लापरवाही समाज के हजारों परिवारों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर रही है।
समिति के संयोजक माणकचंद धाणका ने दोहराया कि 1976 के संशोधन अधिनियम के तहत धानका समाज राजस्थान की अनुसूचित जनजाति में शामिल है। राजस्थान के अधिकांश जिलों में प्रमाण पत्र निर्बाध जारी हो रहे हैं, मगर केवल हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में रोका जाना न्यायालय की अवमानना है।
धरने के 31वें दिन आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया तो यह आंदोलन और उग्र होगा। समाज के नेताओं ने कहा कि प्रमाण पत्र के अभाव में धानका समाज के युवा शिक्षा, छात्रवृत्ति और सरकारी नौकरियों में आरक्षण जैसे संवैधानिक अधिकारों से वंचित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल समाज का नहीं बल्कि न्याय और समानता की लड़ाई है, जिसे किसी भी कीमत पर जारी रखा जाएगा।
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