गुजरात के बड़ौदा स्थित महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ने एक नया पाठ्यक्रम शुरू किया है, जिसमें पीएम मोदी पर ‘मोदी तत्व’ की पढ़ाई होगी। चौंकिए मत आगे पढ़िए गुजरात की Maharaja Sayajirao University of Baroda ने अपने नए सिलेबस में ‘Modi Tattva’ नाम का एक खास मॉड्यूल जोड़ा है।
इसमें Narendra Modi के नेतृत्व, फैसलों और जनता से जुड़ाव को समाजशास्त्र के नजरिए से समझाया जाएगा। यह कोर्स ‘देशभक्ति के समाजशास्त्र’ के तहत पढ़ाया जाएगा और छात्रों को रियल-लाइफ पॉलिटिकल लीडरशिप का एनालिसिस सिखाएगा।
इस खबर के बाहर आने के बाद शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है। इस कोर्स में RSS को सिर्फ एक विचारधारा नहीं, बल्कि एक ग्राउंड लेवल संगठन के रूप में पढ़ाया जाएगा। छात्रों को यह समझने का मौका मिलेगा कि यह संगठन गांवों और समाज में कैसे काम करता है और लोगों को कैसे जोड़ता है। नए सिलेबस में Sayajirao Gaekwad III, Sardar Vallabhbhai Patel, B. R. Ambedkar और Chhatrapati Shivaji Maharaj जैसे नेताओं के विचार और उनके सामाजिक योगदान को भी शामिल किया गया है।
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क्या है नया बदलाव? यह नया सिलेबस BA Sociology के चौथे वर्ष और MA Sociology के पहले वर्ष में पढ़ाया जाएगा, जिसकी शुरुआत जून से होने वाले नए अकादमिक सत्र से होगी। इसमें तीन प्रमुख मॉड्यूल शामिल हैं—
- Sociology of Bharat
- Hindu Sociology
- Sociology of Patriotism
हर मॉड्यूल 4 क्रेडिट का है और इसे शिक्षा को भारतीय संदर्भ और वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं से जोड़ने के मकसद से तैयार किया गया है।
‘Modi Tattva’ में क्या पढ़ाया जाएगा?
समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख वीरेंद्र सिंह के मुताबिक, ‘Modi Tattva’ में पीएम मोदी के नेतृत्व को एक केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया जाएगा। इसमें जर्मन समाजशास्त्री Max Weber के “करिश्माई नेतृत्व” (Charismatic Authority) सिद्धांत के आधार पर यह समझाया जाएगा कि कैसे एक नेता जनसमर्थन बनाता है और नीतियों के जरिए अपनी पहचान स्थापित करता है।
क्यों खास है यह बदलाव?
विश्वविद्यालय का कहना है कि यह कदम समाजशास्त्र की पढ़ाई को ज्यादा प्रैक्टिकल और मौजूदा समय से जोड़ने के लिए उठाया गया है। इसमें भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) को भी शामिल किया गया है, जिससे छात्र देश की परंपराओं और सामाजिक ढांचे को बेहतर समझ सकें। हालांकि, इस बदलाव को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे भारतीय दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाला कदम मान रहे हैं, तो कुछ इसे शिक्षा के राजनीतिकरण से जोड़कर देख रहे हैं।
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