गांधीनगर रेलवे एफओबी की सीढ़ियों को लेकर विवाद गहराया

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-पार्षदों के प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर से की मौके पर निरीक्षण व वैकल्पिक स्थान पर निर्माण की मांग
हनुमानगढ़। गांधीनगर क्षेत्र में निर्माणाधीन रेलवे फुटओवर ब्रिज (एफओबी) की सीढ़ियों के स्थान को लेकर विवाद गहरा गया है। इस संबंध में निवर्तमान सभापति सुमित रणवां के नेतृत्व में विभिन्न वार्डों के निवर्तमान पार्षदों के प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलेक्टर एवं नगर परिषद आयुक्त से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा और मौके पर आकर वस्तुस्थिति का निरीक्षण करने की मांग की। ज्ञापन में बताया गया कि गांधीनगर क्षेत्र के निवासियों को मुख्य बाजार सहित शहर के अन्य हिस्सों तक जाने के लिए वर्षों से किसी सुरक्षित पैदल मार्ग की सुविधा उपलब्ध नहीं है। करीब 10 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद नगर परिषद हनुमानगढ़ और रेलवे प्रशासन के सहयोग से रेलवे लाइन के आर-पार आवागमन के लिए एफओबी निर्माण को मंजूरी मिली थी। इसके लिए लगभग चार वर्ष पूर्व नगर परिषद द्वारा करीब पौने चार करोड़ रुपये रेलवे को जमा भी करवा दिए गए थे।
वर्तमान में एफओबी का लगभग 95 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और केवल गांधीनगर साइड की सीढ़ियों का निर्माण शेष है। विवाद इसी स्थान को लेकर उत्पन्न हुआ है। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, जिस स्थान पर वर्तमान में सीढ़ियां उतारने की योजना बनाई जा रही है, वहां सड़क के दोनों ओर लोगों के मकान और दुकानें स्थित हैं, जिनके पास वैध पट्टे और रजिस्ट्री उपलब्ध हैं। यदि यहां सीढ़ियां बनाई जाती हैं तो कई घरों और दुकानों के मुख्य द्वार बाधित हो जाएंगे, साथ ही शनि मंदिर जाने का रास्ता और दो प्रमुख गलियां भी बंद हो जाएंगी।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि यदि सीढ़ियां संकरी गली में बनाई गईं तो आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस और दमकल वाहन का पहुंचना भी असंभव हो जाएगा। इससे क्षेत्र के लगभग 30 हजार निवासियों, विशेषकर महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।
प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि क्षेत्र में स्थित कन्या विद्यालय तक जाने के लिए भी कोई सुरक्षित मार्ग नहीं है, जिससे छात्राओं को मजबूरी में रेलवे ट्रैक पार करना पड़ता है। इस दौरान कई बार हादसे और जानहानि की घटनाएं भी हो चुकी हैं। इसके अलावा, रेलवे द्वारा करीब तीन वर्ष पूर्व 10 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित सेकंड टिकट विंडो भी रास्ते के अभाव में बंद पड़ी है और वहां कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है।

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