पंजाबी और बॉलीवुड इंडस्ट्री के लोकप्रिय अभिनेता एवं गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ (Satluj) एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। खास बात यह है कि फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज किए जाने के महज तीन दिनों के भीतर ही हटा लिया गया। लंबे समय से रिलीज का इंतजार कर रही इस फिल्म के अचानक आने और फिर गायब हो जाने से दर्शकों के बीच कई सवाल खड़े हो गए हैं।
बताया जाता है कि यह फिल्म पिछले चार वर्षों से रिलीज से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रही थी। जब दर्शकों को इसकी ओटीटी रिलीज की जानकारी मिली तो इसे देखने को लेकर उत्साह बढ़ गया। कई लोगों ने फिल्म देख भी ली, जबकि कुछ दर्शकों को इसकी रिलीज के बारे में पता ही नहीं चल पाया क्योंकि इसे बिना किसी बड़े प्रचार के प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया गया था। लेकिन रिलीज के कुछ ही दिनों बाद इसे हटा दिए जाने से सोशल मीडिया पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, फिल्म को हटाने की एक बड़ी वजह सेंसर बोर्ड की आपत्तियां हो सकती हैं। कहा जा रहा है कि फिल्म में करीब 127 कट्स लगाने की मांग की गई थी, जिन्हें अब तक लागू नहीं किया गया। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसे हटाए जाने के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।
फिल्म की रिलीज और हटाए जाने के फैसले को लेकर दर्शकों के मन में कई तरह के सवाल हैं। सोशल मीडिया पर लोग यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर फिल्म को पहले रिलीज क्यों किया गया और फिर अचानक क्यों हटा लिया गया। इस पूरे मामले पर दिलजीत दोसांझ और फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान दोनों ने प्रतिक्रिया दी है। वहीं ZEE5 की ओर से भी यह कहा गया है कि प्लेटफॉर्म फिल्म के साथ खड़ा है। इसके बावजूद फिल्म के भविष्य को लेकर असमंजस बना हुआ है।
सूत्रों के मुताबिक, फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटाने का फैसला जल्दबाजी में नहीं लिया गया, बल्कि विभिन्न पहलुओं की समीक्षा के बाद यह कदम उठाया गया। हालांकि आधिकारिक तौर पर स्पष्ट कारण सामने नहीं आए हैं, लेकिन कई संभावित वजहों पर चर्चा हो रही है, जिनमें सेंसर से जुड़े मुद्दे प्रमुख माने जा रहे हैं।
क्या है ‘सतलुज’ की कहानी?
यह फिल्म पहले ‘पंजाब 95’ नाम से बनाई गई थी, जिसे बाद में बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया। फिल्म प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और संघर्षों पर आधारित है। खालरा ने 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों और हजारों अज्ञात लोगों के अवैध अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों को उजागर किया था।
फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने मुख्य भूमिका निभाई है और उनके किरदार के जरिए जसवंत सिंह खालरा के साहस, संघर्ष और सच्चाई की लड़ाई को दिखाने की कोशिश की गई है। दिलजीत ने भी इस मामले पर कहा है कि वे और उनकी टीम लगातार इस बात पर विचार कर रहे हैं कि फिल्म को दोबारा दर्शकों तक कैसे पहुंचाया जाए।
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