– 10 दिसम्बर के लाठीचार्ज से किसानों में आक्रोश, गुरुद्वारा सिंह सभा में प्रेस वार्ता कर आंदोलन तेज करने का ऐलान
हनुमानगढ़। टिब्बी एथनॉल फैक्ट्री को लेकर चल रहा विरोध आंदोलन एक बार फिर उग्र रूप लेने की ओर बढ़ रहा है। 10 दिसम्बर को टिब्बी में किसानों पर हुए पुलिस लाठीचार्ज के विरोध और एथनॉल फैक्ट्री को राठीखेड़ा क्षेत्र में किसी भी हालत में संचालित न होने देने के संकल्प के साथ किसानों ने 17 दिसम्बर को जिला कलेक्टरैट पर विशाल महापंचायत आयोजित करने की घोषणा की। जिसमें किसान नेता राकेश टैक्स सासंद अमराराम गुरमीत सिंह चडूनी और जोगेन्द्र सिंह उग्राहा सहित कई बड़े किसान नेता शिरकत करेगे। यह घोषणा शुक्रवार को गुरुद्वारा सिंह सभा में आयोजित प्रेस वार्ता में की गई, जिसमें विभिन्न किसान नेताओं ने प्रशासन और सरकार की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाते हुए आंदोलन को निर्णायक मोड़ पर ले जाने की चेतावनी दी।
प्रेस वार्ता को किसान नेता मंगेज चौधरी, रामेश्वर वर्मा, रेशम सिंह माणुका, रघुवीर वर्मा, रायसाहब चाहर मल्लड़खेड़ा सहित कई किसान प्रतिनिधियों ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि 10 दिसम्बर को हुए बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज का उद्देश्य किसानों की आवाज को दबाना था, लेकिन इस कार्रवाई ने किसानों के मनोबल को और मजबूत कर दिया है। नेताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस प्रशासन यह कहकर दोष हटाने की कोशिश कर रहा है कि आंदोलन में पंजाब और हरियाणा से लोग शामिल हुए थे। किसानों ने चुनौती दी कि 17 दिसम्बर को प्रशासन हर व्यक्ति का आधार कार्ड देखकर सत्यापित कर ले कि लोग कहां से आए हैं,सभी स्थानीय किसान ही आंदोलन की रीढ़ हैं।
किसान मंगेज चौधरी ने कहा कि यह संघर्ष किसी दल या व्यक्ति का नहीं बल्कि जल, जीवन और जंगल की रक्षा का संघर्ष है। उनका आरोप है कि राठीखेड़ा में प्रस्तावित एथनॉल फैक्ट्री से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। उन्होंने बताया कि फैक्ट्री से हो रहे प्रदूषण से दो किलोमीटर के दायरे में घरों की दीवारें तक काली पड़ रही हैं, और फैक्ट्री द्वारा भूमिगत जल निकालकर दूषित जल दोबारा धरती में छोड़ा जा रहा है, जिससे क्षेत्र की उपजाऊ जमीनें आने वाले समय में बंजर हो सकती हैं।
किसानों के अनुसार, प्रशासन ने रिपोर्ट दी है कि टिब्बी,राठीखेड़ा क्षेत्र में जिस जमीन पर फैक्ट्री स्थापित की जा रही है, वह बंजर है। लेकिन किसानों ने इसे पूरी तरह झूठ करार देते हुए कहा कि जिस जमीन का ठेका 50 हजार रुपये प्रति बीघा तक आता है, वह जमीन बंजर कैसे हो सकती है? किसानों का कहना है कि यह रिपोर्ट केवल फैक्ट्री के पक्ष में वातावरण बनाने के लिए तैयार करवाई गई है।
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